Sunday, May 16, 2010

कम्भाकत यह दिल आज फिर चिल्लाने लगा है .

क्या कहू की आज दिल लिखने को कुछ कर रहा है.
क्यों कहू की दिल कुछ लिखने को क्यों कर रहा है.
गर भी में कहू तो क्या ज़रूरी है की तुम इसे सुनो
लेकिन क्या इस दिल की हमने कभी सूनी है जो इसके कहने पर लिखू.


पता नहीं ऊपर क्या लिखा है, क्यों लिखा है किसे सुनाने को लिखा है, किसे बताने को लिखा है, किसे दिखाने को लिखा है। पता नहीं क्यों आज इस दिल ने इस दिल से कहाँ, की कहाँ कहाँ भटकता रहता है कभी तो फुर्सत हो एक पल की....

कहाँ आ गया हु इस पत्थर के जंगल में, कहाँ खो गया हु, कुछ खबर नहीं, कुछ होश नहीं,
अब तो सब पर भरोसा रहा लेकिन इंसान, इंसानों से भरोसा सा उठ चला है,
अब तो जेब में पढ़ा मोबाइल भरोसा है, लेकिन उससे जब बात करता हु तो जिससे बात करता हु उस पर भरोसा नहीं है।
यह हम कहाँ के लिए चले थे और कहाँ जा रहे है, चलते वक्हत घरवालो ने, मोहल्ले वालो ने दुआए दे थी, अब वोही दुआए जब रंग लाई तो हम्हारे पास उनके लिए ही वक़्त नहीं बचा। यह हम क्यों भाग रहे है इतना, किसके लिए, अपनों के लिए, खैर जाने दो क्या फरक पढ़ता है, किसे कौन ढूँढता है सिवाय इस दिल के,
मगर इस किस्मत का खेल ही खाहियेह की अब तो यह दिल की आवाज़ भी सुनायी देनी बंद हो गयी है। अचा है कम से कम अब मुस्किल तो नहीं होगी इस पत्थर के सेहर में रहने में। और जब यह दिल की आवाज़ बेकाबू होप जायगी तो यहाँ लिख लिया करूँगा। कौन देखने आता है यहाँ।

चलता हु , उम्मीद करता हु की शायद अब भी हाफ़िज़ हो खुदा हमारा ।

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